सोमवार, 27 दिसंबर 2010

बीतते बरस लो नमन !

*


बीतते बरस लो नमन !

*

जुड़ गया एक अध्याय और ,

गिनती आगे बढ़ गई ज़रा ,

जो शेष रहा था कच्चापन ,

परिपक्व कर गए तपा-तपा .

आभार तुम्हारा बरस ,

कि

तोड़े मन के सारे भरम !

*

फिर से दोहरा लें नए पाठ,

दो कदम बिदा के चलें साथ .

बढ़ महाकाल के क्रम में लो स्थान ,

रहे मंगलमय यह प्रस्थान !

चक्र घूमेगा कर निष्क्रम ,

नये बन करना शुभागमन !

अभी लो नमन !

*
- प्रतिभा.

बुधवार, 10 नवंबर 2010

भिक्षां देहि

*
( माँ भारती अपने पुत्रों से भिक्षा माँग रही है- समय का फेर !)

रीत रहा शब्द कोश ,

छीजता भंडार ,

बाधित स्वर ,विकल बोल

जीर्ण वस्त्र तार-तार .

भास्वरता धुंध घिरी

दुर्बल पुकार

नमित नयन आर्द्र विकल

याचिता हो द्वार-

'देहि भिक्षां ,

पुत्र ,भिक्षां देहि !'

*

डूब रहा काल के प्रवाह में अनंत कोश ,

शब्दों के साथ लुप्त होते

सामर्थ्य-बोध

ज्ञान-अभिज्ञान युक्तिहीन ,

अव्यक्त हो विलीन

देखती अनिष्ट वाङ्मयी शब्दहीन

दारुण व्यथा पुकार -

'भिक्षां देहि, पुत्र !

देहि में भिक्षां'

*

अतुल सामर्थ्य विगत

शेष बस ह्रास !

तेजस्विता की आग ,

जमी हुई राख

गौरव और गरिमा उपहास

बीत रही जननी ,तुम्हारी ,

मैं भारती .

खड़ी यहाँ व्याकुल हताश

बार-बार कर पुकार -

'देहि भिक्षां, पुत्र,

भिक्षां देहि'!

*

शब्द-कोश संचित ये

सदियों ने ढाले ,

ऐसे न झिड़को ,

व्यवहार से निकालो

काल का प्रवाह निगल जाएगा

अस्मिता के व्यंजक अपार अर्थ ,भाव दीप्त

आदि से समाज बिंब

जिसमें सँवारे

मान-मूल्य सारे सँजोये ये महाअर्घ

सिरधर ,स्वीकारो

रहे अक्षुण्ण कोश ,भाष् हो अशेष

देवि भारती पुकारे

'भिक्षां देहि !

पुत्र ,देहि भिक्षां !'

*

फैलाये झोली , कोटि पुत्रों की माता ,

देह दुर्बल ,मलीन

भारती निहार रही

बार-बार करुण टेर -

'देहि भिक्षां ,

पुत्र, भिक्षां देहि !'

*

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

दुर्लभ

एक सीमा है हर रिश्ते की ,

एक मर्यादा ,

एक पहुँच!

बस वहीं तक

निश्चित- निश्चिन्त.

शोभनीय -सुरुचिमय .

प्रसन्न और सुन्दर !

*

इसके आगे कोरा छलावा .

विकृत, सामंजस्यहीन ,

दुराव-छिपाव का ग्रहण ,

शंकाओं का जागरण.

क्योंकि अस्लियत

मन जानता है ,

कोई जान सकता भी नहीं.

अवशिष्ट अपराध-बोध ,

अंतरात्मा पर बोझ,

जिससे कहीं छुटकारा नहीं .

*

निर्णय सिर्फ अपना ,

धिक्कारे कोई कितना ,

क्या फ़र्क पड़ेगा

हो जाये विमुख दुनिया ,

न मिले प्रशंसा ,
*

बहुत कुछ छूट जाता है पीछे ,

रह जाता  मिलते-मिलते

जब सौदा नहीं कर सके मन ,

चला आये चुपचाप .

न मिले !

बस,आत्मबल साथ रहे ,

अपने आगे ही

 सिर तो नहीं झुके !

*

जानती हूँ

केवल अशान्ति आएगी हिस्से में.

और निन्दा भी .

स्वीकार !

लाद दिए जिसने कलंक ,

लौट जायेंगे वहीं,

बोझिल धुएँ की धुंध

आत्मा को नहीं व्यापे ,

कोई पछतावा नहीं ,

*

दुख होगा ,

बीत जाएगा धीरे-धीरे ,

बस मेरा 'मैं' .

प्रखर -चैतन्य मय रहे

अपने आप में ,

साथ कोई हो या नहीं ,

अश्रु-धुले स्वच्छ अंतःकरण से दुर्लभ,

और भी कुछ है क्या ?

*

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मैं तुम्हारे साथ होना चाहती हूँ

*
शैशव की लीलाओँ में

वात्सल्य भरे नयनों की छाँह तले ,

सबसे घिरे तुम ,

दूर खड़ी देखती रहूँगी .

यौवन की उद्दाम तरंगों में ,

लोकलाज परे हटा ,आकंठ डूबते रस-फुहारों में

जन-जन को डुबोते ,

दर्शक रहूँगी ,

कठिन कर्तव्य की कर्म-गीता का संदेश

कानों से सुनती-गुनती रहूँगी .

*

लेकिन ,

जब अँधे-युग का ,

सारा महाभारत बीत जाने पर ,

बन-तुलसी की गंध से व्याप्त

अरण्य-प्रान्तर में वृक्ष तले ,

ओ सूत्रधार ,तुम चुपचाप अकेले

अधलेटे अपनी लीला का संवरण करने को उद्यत,

उन्हीं क्षणों में तुम्हारे मन से

जुड़ना चाहती हूँ

तुम्हारे साथ होना चाहती हूँ

*

यहां कुछ समाप्त नहीं होता ,

क्योंकि तुम सदा थे रहोगे ,

और मैं भी .

लीला तो चल रही है

सृष्टि के हर कण में ,

हर तन में ,हर मन में .

इस सीमित में उस विराट् को

अनुभव करना चाहती हूँ.

*

कि सारी वृत्तियों पर छाये

इस सर्वग्रासी राग को,

समा लो अपने में .

लिए जाओ अपने साथ

जो असीम में डूबते मुझसे पार

अनंत होने जा रहा है .

*

वही अनुभूति ग्रहण कर

मन एक रूप हो जाए.

कि यह भी अपरंपार हो जाए .

व्याप्त हो जाए हर छुअन में, दुखन में,

जो चलती बेला छा रही हो तुम्हें !

और फिर अनासक्त ,

डुबो दूँ, अथाह जल में,

अपनी यह रीती गागर

.*

सोमवार, 6 सितंबर 2010

कथा एक -

कथा एक -
*
इन  भीड़ भरी राहों की गहमा-गहमी में  हर ओर पथिक   मिल जाते हैंआगे-पीछे ,
दो कदम साथ कोई कोई चल पाता पर हँस-बोल सभी  जा लगते अपने ही रस्ते.
 अपनी गठरी की गाँठ न कर देना ढीली ,नयनों में कौतुक भर  देखेंगे सभी लोग ,
चलती-फिरती  बातें काफ़ी हैं आपस की ,औरों  के किस्से जाने सबको बड़ा शौक .
*
 वे गाँव- घरों के भीगे हुए पुराने पल ,सड़कों पर बिखरे अगर धूल पड़ जाएगी .
अनमोल बहुत है एक अमानत सी जब तक  ,खुल गई टके भर की कीमत रह जाएगी
जाने क्या लोग समझ लें ,जाने क्या कह दें, बोलना बड़ा भारी पड़ जाता कभी-कभी
चुपचाप ज़रा रुक लें लंबा अनजाना पथ, फिर चल देना है आगे  जिधर राह चलतीं .
*
वैसे तो पात्र बदल जाते हरबार यहाँ पर कथा एक चलती आती है लगातार !
इस पथ के जाने कितने ऐसे किस्से हैं ,संवाद वही ले पर पात्र बदलते बार बार
जाने कितने गुज़रे होंगे इस मारग से ,कितनी आँखें रोई होंगी अनगिनत बार  ,
जाने कितनों की निधि लुट गई अचानक ही ,लग गए साथ सहयात्री बन कर गिरह-मार .
*
जाने कितने गाँवों की पगडंडी चलते हम जैसे  सारे  लोग यहां तक आ पहुँचे, ,
कुछ भटके से तकते हरेक चेहरा ऐसे ,  ख़ुद की   पहचान कहीं खो आए हों जैसे ,
 इस मेले की यह आवा-जाही जो दिखती है, हर संझा को खाली हो जाता सूनसान  ,
थक कर चुपचाप बैठ जाती तरु के तल में दिनभर की चलती थकी हुई यह घूम-घाम.
*
अनजाने आगत के प्रति क्यों पालें  विराग  ,जो द्वार खड़ा उसका भी थोड़ा मान रहे ,
सम हो कर जिसका दाय उसे सौंपो उसका , संयमित मनस् में हर आगत का मान रहे
लंबा अनजाना पथ रे बंधु, ज़रा रुक लें आवेग शमित करने को आगे  कहां ठौर,
कहने को तो  कुछ तो नहीं बचा चुपचाप चलें जब तक राहें मुड़ जाएँ अपनी कहीं और.
*

बुधवार, 18 अगस्त 2010

कुंभ-कथा.

*
(स्वतंत्रता के बाद पहले महाकुंभ के अवसर पर ऐसी अव्यवस्था हो गई  कि भीड़ में अँधाधुंध भागदड़ मच गई और बहुत लोग गिर-गिर कर रौंदे जाते रहे -अधिकारी वर्ग पं. नेहरू के स्वागत में व्यस्त था.तब लिखी गई थी यह  - कुंभ-कथा)
*

मानव के यह आँसू शायद सूख चलें पर ,
मानवता के अश्रु-लिखित यह करुण कहानी अमर रहेगी !
*
स्वतंत्रता के बाद प्रथम ही ,महामृत्यु का निर्मम मेला ,
जाने कौन पाप की छाया लाई महाकुंभ की बेला .
गंगा-यमुना के संगम पर जीवन-मृत्यु गले मिलते थे .
आँसू और रक्त की बूँदें लिए मानवी तन चलते थे .
*
जहाँ अमृत की बूँद गिरी थी वहीं मृत्यु का नृत्य हुआ था .
तीर्थराज की पुण्य-भूमि में भक्ति भाव वीभत्स हुआ था ,
घोर अमाँ की काली छाया, यह संगम श्मशान बना था,
बच कर भागें कहाँ? पगों के आगे तो व्यवधान घना था .
*
गंग-यमुन धाराएँ बहतीं  ,कहो सरस्वति ,स्वर सरिता बन
 इधर काल अपना मुँह बाए, उधऱ हो रहा था अभिनन्दन !
खेल रही थी मृत्यु भाग्य की ओट लिए नर के प्राणों से
जननायक के कर्ण बंद थे किन्तु वहीं स्वागत गानों से ,
*
उन भोगों में डूब कौन सुन पाता तट के आकुल- क्रन्दन !
राग-रंग थे वहाँ  दावतें उड़ती थीं ,उड़ते थे व्यंजन,
 अरी त्रिवेणी ,कहाँ बहा ले जाती तू यह रक्तिम धारा ,
तीरथ व्रत का यही समापन ,किसके पापों का निपटारा .
*
 तीर्थराज की पुण्य-भूमिपर जब-जब उमड़ेगा जन-सागर ,
पुरा कथा की नयी वर्णना इसको किसका पाप कहेगी !
 मानवता के अश्रुलिखित ,यह करुण कहानी अमर रहेगी !
*

शनिवार, 7 अगस्त 2010

सूरज देर से निकला -

*

आज सूरज
रोज से कुछ देर से निकला !
लो ,तुम्हारी हो गई सच बात ,
सूरज देर से निकला !
*
कुछ लगा ऐसा कि लम्बी हो गई है रात !
 और रुक सी गई ,
तारों की चढी बारात .
धीमी पड गई चलती हुई हर साँस
सूरज देर से निकला !
*
घडी धीरे चल रही ,
कुछ सोचता सा काल
धर रहा है धरा पर हर पग सम्हाल-सम्हाल !
बँधा किसकी बाँह में आकाश ,
सूरज देर से निकला !
*
अर्ध-निद्रा या कि सपनों की कुहक- माया
नेह भीगे  मृदुल स्वर लोरी सुनाते थे ,
अनसुने से गीत
रह-रह गूँज जाते थे !
हर नियम अलसा गया है आज
सूरज देर से निकला !
*
देर तक अपना मुझे
टेरा किया कोई !
लगा सारी रात मैं
बिल्कुल नहीं सोई !
फिर कुहासा दृष्टि को बाँधे रहा ऐसा,
कि सूरज देर से निकला !
*

शनिवार, 24 जुलाई 2010

बताओ क्या करोगे

**
जब न मैं होऊ ,बताओ क्या करोगे १
नए ढँग से ज़िन्दगी का हर पहाड़ा ,
बहुत श्रम से सीखना होगा दुबारा
इसलिए कुछ धैर्य धर शुरुआत कर लो ,
भंग होगा क्रम जहाँ मेरा -तुम्हारा !
कौन समझेगा ,अकेले ही सहोगे !
*
मुझे अब कोई भनक लगने लगी है ,
कान में कुछ वंशियाँ बजने लगी हैं ,
दूर के कुछ स्वर सुनाई दे रहे हैं
देहरी हल्दी लगे अक्षत झरे हैं
हो रहा जो दोष किसके सर धरोगे
*
एक दिन भूले भटकते आ गए थे ,
लौटना ही नियति है फिर से वहीं पर !
सिर्फ़ अपने ही लिए जीवन नहीं है
दाँव हर पल लग सके जो खुश वही है
कौन समझेगा ,किसी से क्या कहोगे!
*
समय भी रुकता नहीं है बीतता है
और साँसों से भरा घट रीतता है .
एक दिन दुनिया समझना है स्वयं ही ,
भान अपना रहे अपने को स्वयं ही
साथ रह कर भी सभी से दूर होगे ,
*
यह निमंत्रण कौन अनदेखी सका कर ,
यह अकेली यात्रा है छोड़ कर घर
क्या पता कितना समय अब भी रहा है ,
पर समेटूँ जो बहुत बिखरा हुआ है /
बीच की इस अवधि को कैसे भरोगे !
*
जिन्दगी तो हर तरह जीनी पड़ेगी
सब बहाती काल की धारा रहेगी
कौन कब कर ले न जाने कौन सा रुख
यही निर्भरता बहुत देगी कभी दुख ,
इन्हीं लहरों में विवश हो कर बहोगे !

किन्तु मैं भी क्या कहूँ इस मोड़ पर आ ,
समझना होगा कि अब तक जो न समझा .
आड़ अब कोई न होगा आसरा भी ,
यों अचानक ही बहुत घबराएगा जी
मार लोगे मन कि अनखाए रहोगे ,
*
और फिर भी चलेगा अविराम जीवन
किस तरह बीतें न जाने शेष के दिन !
कौन देखेगा कि तुम क्या चाहते हो ,
किस तरह मंझधार अपनी थाहते हो
भीड़ में भी एक सन्नाटा गहोगे !!
*

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

कौन गति !

*
कौन गति !
एक नन्हीं-सी ज्योति !
माटी में आँचल में अँकुआता बीज !
काल -धारा में बहे जा रहे जीवन को
निरंतरता की रज्जु में बाँधता,
भंगुर-से तन में सँजोए नवनिर्माण कण
काल से आँख मिलाती नव-जीवन रचती
धरती या नारी ?
*
उस अंतर्निहित ज्योति का स्फोट
दर्पण पर प्रतिवर्तित असह्य प्रकाश !
स्तबध काल-भुजंग अँधिया जाये
अपना दाँव न चल सके
तो तुम सहानुभूत या भय-भीत से
बोल दिए -
'नारी की छाया परत
अंधा होत भुजंग !'
*
निःस्व समर्पण के क्षणों में
बहुत भाती है न बहुरिया ?
फिर मस्ती में डूबा मन ,और आहत अहं
जब बिठा नहीं पाता संगति
व्यवहार -जगत की वास्तविकताओं से
परिणामों से दामन बचा
बचते-भागते
उसी पर दोष धरते, गरियाते ,
बन जाते हो ख़ुद
राम की बहुरिया !
*
सोचते रहते हो -
'तिनकी कौन गति
जे नित नारी संग?'
सुनो कबीर,
जिसमें सामर्थ्र्य होगी, भागेगा नहीं,
अर्धांग में धारण कर
बन जाएगा पूर्ण-पुरुष !
निर्भय-निर्द्वंद्व !
*

सोमवार, 14 जून 2010

भइया का पत्र

चिट्ठी के एक ही पृष्ठ से मैं पूरी गाथा पढ़ जाऊं !
नेह तुम्हारा पा ,जाने क्यों उमड़-उमड़ आता मेरा मन ,
बड़े बंधु के आगे जगता ,छोटी सी बहिना का बचपन !
इस कमरे में जहाँ बैठ कर पढ़े जा रही तेरे आखर ,
हर कोने में लगता जैसे नया उजास छा गया आकर
जाने क्यों आँखें भऱ आईं कोई पूछे क्या समझाऊं !
*
भले एक आभास मिला लगता तू सिर पर हाथ धर गया
तू न कहे पर अंतरतम तक पहुँचा भाव, अभाव भर गया !
कागज पर घुल बिखर गई पर वही इबारत उभरी उर पर !
पढ़ना चाहा बार-बार हर बार नयन आये पर भर भर
इतना रोदन उमड़ पड़ा ,आँचल भर आँसू कहाँ छिपाऊँ !
*
उदासीनताओं के झटके जहाँ कठिन कर गये हृदय-तल!
आज तुम्हारा स्नेह नयन में मेरे भर देता आँसू जल
कोई कमी नहीं फिर भी तो मन करता है तुझे पुकारूँ
तेरे नयनों में अपना वह पहलेवाला रूप निहारूं !
व्याकुल मन ही सुने न मेरी कैसे और किसे बतलाऊं !
*
इतने अश्रु बहाये सचमुच सारा मन का मैल धुल गया
और कंठ में आ अंतर की रुद्ध नदी का वेग खुल गया
भइया, आज तुम्हारी चिट्ठी हिला गई मन के तारों को ,
अब तो निभा लिये जाऊंगी ,दुनिया भर के व्यवहारों को
जिससे टिकी पढ़ रही कागज दीवारों को तिलक लगाऊँ !
*
भइया आज तुम्हारा ख़त पढ़ जाने कितना रोना आया ,
धन सा मन में धरे रही सब, कुछ न किसी को भी बतलाया
उस घर का थोड़ा-सा खाना ,शायद मुझको तृप्ति दिला दे ,
और वहाँ थोड़ा रुक जाना , यह छाया अवसाद घटा दे !
थोड़ा सा आकाश वहाँ का अपने नयनों में भर लाऊं !
*
अपना यह घर, पर वह घर किस तरह पराया करके भूलूँ
बार-बार मन करता जाकर वही पुरानी देहरी छू लूँ !
भइया तेरे पावन मन का,और अहेतुक नेह-जतन का ,
इतना बल मिल गया कि सारा श्रम विश्राम पा गया मन का
आज तुम्हारी यह पाती ही शुभाशीष सी माथ चढ़ाऊं !
*
पूछेंगे सब लोग हुआ क्या मैं किस-किस को उत्तर दूंगी
कभी किसी से बाँट न पाऊं उस मन को कैसे टोकूंगी
नाम तुम्हारा जब आयेगा काम-धाम सब पड़ा रहेगा
पूछो मत कुछ आज आयगा सारे दिन रह-रह कर रोना
जाने कब की रुकी रुलाई उमड़े कैसे बस कर पाऊँ !
*

बुधवार, 9 जून 2010

बहुत दिन हो गए

*
बहुत दिन हो गए
नदिया बड़ी संयत रही है .
लहर के जाल में सब-कुछ समाए जा रही है .
कहीं कुछ शेष बचता ,जमा बैठा जो तलों में .
बहुत दिन से न जागा वेग
मंथर वह रही बस
प्रवाहित मौन सी चुपचाप धारा ,
समेटे जाल सारे, डुबोए जल में समाए .
कहीं बरसा न पानी ,हिम-शिखर पिघला न कोई
उमड़ने दो बहुत दिन हो गए हैं ,
समेटे क्यों नहीं पथ के विरोधों को,
सभी कुछ छोड़ बढ़ जाए
कहीं आगे .
कगारें तोड़ कर लहरे समेंटें सब करें प्लावित
बहुत दिन हो गए ,
सभी कुछ देखते- रहते ,
बहुतदिन हो गए ,यों एक सा बहते ,
कहीं जो बाढ़ पानी में उमड़ आए .
*
नदी को बाँधना मत ,
रोकना मत ,शाप है जल का
बहुत कुछ तोड़ जाएगा ,
सभी कुछ टूट बिखरे कुछ न छोड़ेगा ..बहा देगा
तभी फिर देखना तटबंध सारे तोड़ते ढहते .
कि हाहाकार के स्वर वेग में बहते
लगे प्रतिबंध सारे मोड़ते अपनी तरह
बस एक झटके से
कगारों के बिना बढती नदी के वेग को चढते ,
प्रलय का रूप धरने से कहो फिर कौन टोकेगा
किसीमें दम कि चढ़ते पानियों का वेग रोकेगा
किसी में दम उफनती बाढ़ का आवेग रोकेगा .
बहुत दिन हो गए .
*
बहुत दिन हो गए

चुपचाप है ,बहती हुई भी शान्त संयत सी ,
कि गहरी घूर्णियों में घट रहा क्या कौन सोचेगा!
बहुत दिन हो गए ये तट नहीं भीगे
लहर कोई बहा दे रेत के डूहे ,
बराबर कर सतह इकसार कर डाले ,
तलों में जमी तलछट फिर निकल कर भूमि पर छाए ,
जिन्हें कर चूर बिखराया विरोधों को ,
सभी कुछ छोड़ बढ़ जाए कि
कि वर्जित सीढ़ियाँ चढ़ते ,ढहाते पुल
बढ़ी आगे चली जाए
कि पानी ,ढूँढ लेता राह अपनी
तोड़ बाधाएँ .
*
नदी के पाट मत देखो
नदी के घाट मत रोको
बहेगी मुक्त हो प्रतिबंध तोड़ेगी ,
प्रवाहों मे बहाती हरहराती ,कुछ न छोड़ेगी .
अगर फिर तुल गई,
रुख धार मोड़ेगी
युगों के बाद उन रीते कछारों को कभी देखो ,
कभी नदिया रहे ,
गहरे कगारों को जभी देखो
किसी अन्याय का प्रतिफल समझ लेना ,
नदी को दोष मत देना.
*
अभी तो शान्त बहने दो ,
तरल जल स्वच्छ रहने हो ,
अनादर और मनमानी नहीं सह पायगी नदिया
अगर समझो इशारों में बहुत कह जायगी नदिया .
समुन्दर की तरफ हर राह नदिया की ,
रुकेगी क्यों ?
बनाती रास्ता बढ़ जायगी नदिया.
बहुत दिन हो गए .
*

मंगलवार, 4 मई 2010

रत्ना की चाह -

केवल तुम्हारी थी
थोड़ा-सा आत्म-तोष चाहता रहा था मन
पीहर में पति- सुख पा इठलाती बाला बन
मन में उछाह भर ताज़ा हो जाने का ,
बार-बार आने का
अवसर,
सुहाग-सुख पाने का .
*
थोड़ा सा संयम ही
चाहा था रत्ना ने ,
भिंच न जाय मनःकाय
थोड़ा अवकाश रहे,
खुला-धुला ,घुटन रहित ,
नूतन बन जाए
पास आने की चाह .
*
कैसे थाह पाता
विवश नारी का खीझा स्वर
तुलसी ,तुम्हारा नर!
स्वामी हो रहो सदा
अधिकारों से समर्थ
पति की यही तो शर्त !
*
सह न सके .
त्याग गए कुंठा भऱ .
सारा अनर्थ-दोष
एकाकी नारी पर !

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

चरैवेति'

* '
यह संस्कृति का वट-वृक्ष पुरातन-चिरनूतन
कह 'चरैवेति' जो सतत खोजता नए सत्य
जड़ का विस्तार सुदूर माटियों को जोड़े
निर्मल ,एकात्म चेतना का जीवन्त उत्स,
*
आधार बहुत दृढ़ है कि इसी की शाखाएँ
मिट्टी में रुप कर स्वयं मूल बनती जातीं,
जिसकी छाया में आर्त मनुजता शीतल हो
चिन्ताधारा में नूतन स्वस्ति जगी पाती
*
इस ग्रहणशीलता पर संशय न उठे कोई
हर फल में रूप धरे संभावित वृक्ष बीज
वन-सागर पर्वत सहित कुटुंब धरा का हो,
मानवता का आवास द्वीप औ' महाद्वीप !

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

कबाड़खाना

*
हर घर में
कुछ कुठरियाँ या कोने होते हैं
जहाँ फ़ालतू कबाड़ इकट्ठा रहता है ।
मेरे मस्तिष्क के कुछ कोनो में भी
ऐसा ही अँगड़-खंगड़ भरा है ।
जब भी कुछ खोजने चलती हूँ
तमाम फ़ालतू चीज़ें सामने आ जाती हैं ,
उन्हीं को बार-बार ,
देखने परखने में लीन
भूल जाती हूँ
कि क्या ढूँढने आई थी!
*

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

केलिफ़ोर्निया का राज-पुष्प

वन घासों के बीच
झिलमिलाते इतने दीप !
*
इस निर्जन वन-खंडिका में
संध्याकाश के नीचे
कौन धर गया ?
*
क्रीक के दोनों ओर ,
ढालों पर, निचाइयों में
और हरी-भरी ऊँचाइयों पर भी .
सघन श्यामलता में दीप्त होते
चंचल हवा से अठखेलियाँ करते
कितने -कितने दीप !
*
सुनहरी लौ के प्रतिबिंब
तल की जल-धारा में बहते उतराते
सीढ़ियों पर बिखर-बिखर
लहरों के साथ बहते चले जा रहे
इस विजन में फूले हैं अनगिनती
सुनहरे पॉपी ,
उजास बिखेरते इस एकान्त साँझ में !
*

शनिवार, 27 मार्च 2010

मैं तुम्हारी प्रार्थना हूँ

स्वर मुझे दो ,मैं तुम्हारी प्रार्थना हूँ .
*
भाव में डूबे अगम्य अगाध होकर ,
व्याप जाने दो हवाओं की छुअन में ,
लहर में लिखती रहूँ जल वर्णमाला ,
कौंध भऱ विद्युतलता के अनुरणन में
कुहू घन अँधियार व्याप्त निशीथिनी में
किसी संकल्पित सुकृत की पारणा हूँ
*
शंख की अनुगूँज का अटका हुआ स्वर
घाटियों के गह्वरों में घूम-आए ,
शिखऱ छू जब अंतरिक्षों में बिला ,
आकाश गंगा के तटों को चूम आए
बहुत लघु हूँ ,बहुत भंगुर हूँ भले ही ,
पर किसी अपवाद की संभावना हूँ !
*
घंटियाँ बजने लगी हैं शिखर पर अब ,
लौ कपूरी डालती फेरे चतुर्दिक्,
लहर में झंकारते अविरल मँजीरे
आरती का ताप हो जाता समर्पित ,
जन्म फेरा बन भले ही रह गया ,
चिर-काल की पर मैं निरंतर साधना हूँ !
*

बुधवार, 17 मार्च 2010

संदर्भहीन

एक पुरानी कविता -

सपनों जैसे नयनों में झलक दिखा जाते
कैसे होंगे सरिता तट, वे झाऊ के वन !
*
घासों के नन्हें फूल उगे होंगे तट पर ,
रेतियाँ कसमसा पग तल सहलाती होंगी
वन-घासों को थिरकन से भरती मंद हवा ,
नन्हीं-नन्हीं पाँखुरियाँ बिखराती होगी
जल का उद्दाम प्रवाह अभी वैसा ही है ,
या समा गया तल तक आ कोई खालीपन !
*
जिन पर काँटों की बाड़ अड़ी थी पहले से ,
वर्जित उन कुंजों में कोई पहुँचा है क्या .
संदर्भहीन कर देता सारे ही नाते .
धीमे से कानों तक आता कोई स्वर क्या
क्या बाँस वनों में पवन फूँकता है वंशी ,
रातों में रास रचाता क्या मन-वृंदावन !
*
ढलते सूरज की किरणें लहरों में हिलमिल ,
जब जल के तल में रचें झिलमिली राँगोली,
शिखरों पर बिखरी रहें सुनहरी संध्यायें
झुनझुना बना दे तरुओं को खगकुल टोली
लहरों का तट तक आना ,और बिखर जाना
कर जाता मन को अब भी वैसा ही उन्मन!
*
क्या वर्तमान से कभी परे हो जाते हो
बेमानी लगने लगता सारा किया धरा ,
सब कुछ पाने बाद कभी ऐसा लगता ,
कुछ छूट गया है कहीं, रह गया बिन सँवरा.
मन पूरी तरह डूब पाता क्या रंगों में ,
यह भी सच-सच बतला दो अब कैसे हो तुम !
*

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

प्रश्न

जब अपने से छोटे
और उनसे भी छोटे
रुख़सत हो
निकलते चले जाते हैं सामने से
एक-एक कर ,
अपना जीवन अपराध लगता है .
*
जब वंचित रह जाते हैं लोग,
उस सबसे जो हमने पाया ,
तरसते देख गुनाह लगती हैं
अपनी सुख-सुविधायें कि दूसरे का हिस्सा
हम अब भी दबाये बैठे हैं .
अपनी सारी क्षमताये बेकार
कि अब कौन सी सार्थकता बाकी रह गई ?
*
भाग्यशाली हैं वे ,
जो जीवन-मृत्यु को
सही सम्मान दे ,
समय से प्रस्थान कर जाते हैं .
*

कितना सुन्दर

कितना सुन्दर है ये जीवन ,मेरे मन !
*
घूम के आतीं जो ऋतुओं के साये
पत्ते उड़ाती भागती हवाये ,
कभी बरसात कभी धूप की तपन
*
घेरे हुये घरती गगन की बाहें .
चूमती पग-पग बढ़ती हुई राहें
साथ में चले जो कोई हो मगन !
*
कहीं कंकरों के दाँव पाँवों तले
नर्म माटी की छुअन भी मिले
कभी हँसी खिले कभी मिले यहां गम !
*
चला आता हँसता त्यौहार का मौसम .
पतझर आया आयगा बहार का मौसम
*

शनिवार, 23 जनवरी 2010

लौट चल रे

लौट चल रे मन ,उसी फिर कटघरे में ,
फिर वहीं के एक खाँचे में समाने ,
उसी चक्कर में निरंतर घूमने को ,
जो कहीं भी ले न जाये कुछ बताने ,
*
पुरातन वटवृक्ष जिसकी छाँह में ,
लिक्खा उधारों का रहा जो ब्याज बाकी
कौन जाने कौन चुकता कर गया है ,
कौन ले कर भार बैठा मूल का भी
लौट चल रे ,यहां रोकेगा न कोई ,
स्वयं से कैसे करेगा अब बहाने !
*
ज्यों पिता का प्यार पुत्री को बिदा दे ,
डालियां हिलती हुई आशीष जैसी ,
सघन पत्तों से छलक कर तरलतायें
उस झुके से शीष को अभिषेक देतीं
क्या पता कब कौन लौटेगा यहां पर
एक दूजे की कथा सुनने-सुनाने
*
लाभ हानि विचारने का सुध नहीं क्यों
जब निभाना हैं यहाँ के सभी धंधे
काल के कुछ दंश तीखे हैं बहुत
पर जी रहे है अभी तक तो भले चंगे
बुढ़ापे को याद हैं अपना ज़माने
और यौवन के निराले ही फ़साने
*

सोमवार, 18 जनवरी 2010

प्रस्थान -

जब अपने से छोटे
और उनसे भी छोटे
रुख़सत हो
निकलते चले जाते हैं सामने से
एक-एक कर ,
अपना जीवन अपराध लगता है .
जब वंचित रह जाते हैं लोग,
उस सबसे जो हमने पाया ,
तरसते देख गुनाह लगती हैं
अपनी सुख-सुविधायें कि दूसरे का हिस्सा
हम अब भी दबाये बैठे हैं .
अपनी सारी क्षमताये बेकार
कि अब कौन सी सार्थकता बाकी रह गई ?
भाग्यशाली हैं वे ,
जो जीवन-मृत्यु को
सही सम्मान दे ,
समय से प्रस्थान कर जाते हैं .
*

शनिवार, 16 जनवरी 2010

चलो कहीं निकल चलें

!
बस्ती से दूर किसी जंगल मे टहल चलें !
खिले-खिले मुक्त मन लपेटलाग छोड सभी ,
खिल-खिल हँसी से भरी मनचाही बातें हों !
अपनी बेवकूफियाँ सुनाएं - सुने मुक्तमन ,
किसी और नई जगह निकल चलें-सैर करें !
*
नदिया के तीर बैठ लहरों की बनन - मिटन ,
फिसलती बालू से सीप-शंख बीनेगे ,
बीती सो बात गई ,रीति-नीति सारी
बेमानी हो छूट गई !
सारे ये झंझट अब यहीं छोड़ निकल चलें !
*
.टेरना बेकार ,गुनगुनाता चल अकेला मन ,
प्रात कहीं होगा और रात कहीं बीतेगी ,
अपने काम का हो जो ,समेटने को क्या धरा,
फेन बुलबुलों से भरी प्याली तो रीतेगी !
कहे-सुने बिना ,अनायास उठ निकल चलें !
चलो कहीं निकल चलें !
*

बुधवार, 13 जनवरी 2010

ले चलो उन निर्जनों में

आज माँझी ले चलो उन निर्जनों में ,
किसी पग की चाप से आगे वनों में
ले चलो उस तट बिना पहचानवाले ,
जहां कोई आ नहीं पाये पता ले
*
जिस जगह ,संध्या-सुबह चुपचाप आयें ,
रात्रियाँ आ मौन ही फिर लौट जायें ,
जहाँ कोई प्रश्न उठ पाये न आगे ,
जिस जगह ,बस मौन का ही राग जागे
*
चलो अब कुछ काल वहीं व्यतीत कर लें
यहँ से कुछ भी बताये बिन निकल लें
दूर इतनी यहाँ की किरणे न आयें
यहाँ की यादें वहाँ तक जा न पायें
*
पार सबको कर चलो ऐसी दिशा में ,
इन तटों से दूर हो कुछ दिन बिताने
ले चलो उस ओर कोई द्वीप होगा ,
वहाँ से आकाश बहुत समीप होगा .
*
चलो मेरे साथ चाहे लौट आना ,
यहँ से बस कर चलो कोई बहाना
ले चलो उन दूरियों तक जहां कोई भी न जाये
या कि उन गहराइयों में जहाँ कोई डूब जाये
*
चलो माँझी उघर के शीतल घनों में
आज माँझी ले चलो उन निर्जनों में .
*

शनिवार, 2 जनवरी 2010

एक जनम

मुक्ति नहीं,
एक जनम ,
मगन मगन !
*
तन्मय विशेष
कुछ न शेष
पूर्ण लीन
मात्र अनुरक्ति
हो असीम तृप्ति
सिक्त मन-गगन
एक जनम ,
*
धरा हो ऋतंभरा ,
जीवन संतृप्ति भरा
तन ,मन विभोर
निरखें दृग कोर ,
मेघ वन सघन .
एक जनम
*
मुक्ति नहीं,
हो अनन्त राग ,
विरहित विराग
लहर-लहर दीप ,
सिहर-सिहर प्रीत
नृत्यरत किरन
एक जनम
*
भर-पुरे अस्त उदय
भाव-भेद शमित,
परम तोष
शमित ताप
स्निग्ध दीप्तिमय गगन.
एक जनम ,
*
मुक्ति नहीं ,
परम परिपूर्ण मगन,
लघु भले कि लघुत्तम
एक जनम.
जनम-जनम की मिटे थकन
एक जनम .