सोमवार, 27 दिसंबर 2010

बीतते बरस लो नमन !

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बीतते बरस लो नमन !

*

जुड़ गया एक अध्याय और ,

गिनती आगे बढ़ गई ज़रा ,

जो शेष रहा था कच्चापन ,

परिपक्व कर गए तपा-तपा .

आभार तुम्हारा बरस ,

कि

तोड़े मन के सारे भरम !

*

फिर से दोहरा लें नए पाठ,

दो कदम बिदा के चलें साथ .

बढ़ महाकाल के क्रम में लो स्थान ,

रहे मंगलमय यह प्रस्थान !

चक्र घूमेगा कर निष्क्रम ,

नये बन करना शुभागमन !

अभी लो नमन !

*
- प्रतिभा.

बुधवार, 10 नवंबर 2010

भिक्षां देहि

*
( माँ भारती अपने पुत्रों से भिक्षा माँग रही है- समय का फेर !)

रीत रहा शब्द कोश ,

छीजता भंडार ,

बाधित स्वर ,विकल बोल

जीर्ण वस्त्र तार-तार .

भास्वरता धुंध घिरी

दुर्बल पुकार

नमित नयन आर्द्र विकल

याचिता हो द्वार-

'देहि भिक्षां ,

पुत्र ,भिक्षां देहि !'

*

डूब रहा काल के प्रवाह में अनंत कोश ,

शब्दों के साथ लुप्त होते

सामर्थ्य-बोध

ज्ञान-अभिज्ञान युक्तिहीन ,

अव्यक्त हो विलीन

देखती अनिष्ट वाङ्मयी शब्दहीन

दारुण व्यथा पुकार -

'भिक्षां देहि, पुत्र !

देहि में भिक्षां'

*

अतुल सामर्थ्य विगत

शेष बस ह्रास !

तेजस्विता की आग ,

जमी हुई राख

गौरव और गरिमा उपहास

बीत रही जननी ,तुम्हारी ,

मैं भारती .

खड़ी यहाँ व्याकुल हताश

बार-बार कर पुकार -

'देहि भिक्षां, पुत्र,

भिक्षां देहि'!

*

शब्द-कोश संचित ये

सदियों ने ढाले ,

ऐसे न झिड़को ,

व्यवहार से निकालो

काल का प्रवाह निगल जाएगा

अस्मिता के व्यंजक अपार अर्थ ,भाव दीप्त

आदि से समाज बिंब

जिसमें सँवारे

मान-मूल्य सारे सँजोये ये महाअर्घ

सिरधर ,स्वीकारो

रहे अक्षुण्ण कोश ,भाष् हो अशेष

देवि भारती पुकारे

'भिक्षां देहि !

पुत्र ,देहि भिक्षां !'

*

फैलाये झोली , कोटि पुत्रों की माता ,

देह दुर्बल ,मलीन

भारती निहार रही

बार-बार करुण टेर -

'देहि भिक्षां ,

पुत्र, भिक्षां देहि !'

*

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

दुर्लभ

एक सीमा है हर रिश्ते की ,

एक मर्यादा ,

एक पहुँच!

बस वहीं तक

निश्चित- निश्चिन्त.

शोभनीय -सुरुचिमय .

प्रसन्न और सुन्दर !

*

इसके आगे कोरा छलावा .

विकृत, सामंजस्यहीन ,

दुराव-छिपाव का ग्रहण ,

शंकाओं का जागरण.

क्योंकि अस्लियत

मन जानता है ,

कोई जान सकता भी नहीं.

अवशिष्ट अपराध-बोध ,

अंतरात्मा पर बोझ,

जिससे कहीं छुटकारा नहीं .

*

निर्णय सिर्फ अपना ,

धिक्कारे कोई कितना ,

क्या फ़र्क पड़ेगा

हो जाये विमुख दुनिया ,

न मिले प्रशंसा ,
*

बहुत कुछ छूट जाता है पीछे ,

रह जाता  मिलते-मिलते

जब सौदा नहीं कर सके मन ,

चला आये चुपचाप .

न मिले !

बस,आत्मबल साथ रहे ,

अपने आगे ही

 सिर तो नहीं झुके !

*

जानती हूँ

केवल अशान्ति आएगी हिस्से में.

और निन्दा भी .

स्वीकार !

लाद दिए जिसने कलंक ,

लौट जायेंगे वहीं,

बोझिल धुएँ की धुंध

आत्मा को नहीं व्यापे ,

कोई पछतावा नहीं ,

*

दुख होगा ,

बीत जाएगा धीरे-धीरे ,

बस मेरा 'मैं' .

प्रखर -चैतन्य मय रहे

अपने आप में ,

साथ कोई हो या नहीं ,

अश्रु-धुले स्वच्छ अंतःकरण से दुर्लभ,

और भी कुछ है क्या ?

*

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मैं तुम्हारे साथ होना चाहती हूँ

*
शैशव की लीलाओँ में

वात्सल्य भरे नयनों की छाँह तले ,

सबसे घिरे तुम ,

दूर खड़ी देखती रहूँगी .

यौवन की उद्दाम तरंगों में ,

लोकलाज परे हटा ,आकंठ डूबते रस-फुहारों में

जन-जन को डुबोते ,

दर्शक रहूँगी ,

कठिन कर्तव्य की कर्म-गीता का संदेश

कानों से सुनती-गुनती रहूँगी .

*

लेकिन ,

जब अँधे-युग का ,

सारा महाभारत बीत जाने पर ,

बन-तुलसी की गंध से व्याप्त

अरण्य-प्रान्तर में वृक्ष तले ,

ओ सूत्रधार ,तुम चुपचाप अकेले

अधलेटे अपनी लीला का संवरण करने को उद्यत,

उन्हीं क्षणों में तुम्हारे मन से

जुड़ना चाहती हूँ

तुम्हारे साथ होना चाहती हूँ

*

यहां कुछ समाप्त नहीं होता ,

क्योंकि तुम सदा थे रहोगे ,

और मैं भी .

लीला तो चल रही है

सृष्टि के हर कण में ,

हर तन में ,हर मन में .

इस सीमित में उस विराट् को

अनुभव करना चाहती हूँ.

*

कि सारी वृत्तियों पर छाये

इस सर्वग्रासी राग को,

समा लो अपने में .

लिए जाओ अपने साथ

जो असीम में डूबते मुझसे पार

अनंत होने जा रहा है .

*

वही अनुभूति ग्रहण कर

मन एक रूप हो जाए.

कि यह भी अपरंपार हो जाए .

व्याप्त हो जाए हर छुअन में, दुखन में,

जो चलती बेला छा रही हो तुम्हें !

और फिर अनासक्त ,

डुबो दूँ, अथाह जल में,

अपनी यह रीती गागर

.*

सोमवार, 6 सितंबर 2010

कथा एक -

कथा एक -
*
इन  भीड़ भरी राहों की गहमा-गहमी में  हर ओर पथिक   मिल जाते हैंआगे-पीछे ,
दो कदम साथ कोई कोई चल पाता पर हँस-बोल सभी  जा लगते अपने ही रस्ते.
 अपनी गठरी की गाँठ न कर देना ढीली ,नयनों में कौतुक भर  देखेंगे सभी लोग ,
चलती-फिरती  बातें काफ़ी हैं आपस की ,औरों  के किस्से जाने सबको बड़ा शौक .
*
 वे गाँव- घरों के भीगे हुए पुराने पल ,सड़कों पर बिखरे अगर धूल पड़ जाएगी .
अनमोल बहुत है एक अमानत सी जब तक  ,खुल गई टके भर की कीमत रह जाएगी
जाने क्या लोग समझ लें ,जाने क्या कह दें, बोलना बड़ा भारी पड़ जाता कभी-कभी
चुपचाप ज़रा रुक लें लंबा अनजाना पथ, फिर चल देना है आगे  जिधर राह चलतीं .
*
वैसे तो पात्र बदल जाते हरबार यहाँ पर कथा एक चलती आती है लगातार !
इस पथ के जाने कितने ऐसे किस्से हैं ,संवाद वही ले पर पात्र बदलते बार बार
जाने कितने गुज़रे होंगे इस मारग से ,कितनी आँखें रोई होंगी अनगिनत बार  ,
जाने कितनों की निधि लुट गई अचानक ही ,लग गए साथ सहयात्री बन कर गिरह-मार .
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जाने कितने गाँवों की पगडंडी चलते हम जैसे  सारे  लोग यहां तक आ पहुँचे, ,
कुछ भटके से तकते हरेक चेहरा ऐसे ,  ख़ुद की   पहचान कहीं खो आए हों जैसे ,
 इस मेले की यह आवा-जाही जो दिखती है, हर संझा को खाली हो जाता सूनसान  ,
थक कर चुपचाप बैठ जाती तरु के तल में दिनभर की चलती थकी हुई यह घूम-घाम.
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अनजाने आगत के प्रति क्यों पालें  विराग  ,जो द्वार खड़ा उसका भी थोड़ा मान रहे ,
सम हो कर जिसका दाय उसे सौंपो उसका , संयमित मनस् में हर आगत का मान रहे
लंबा अनजाना पथ रे बंधु, ज़रा रुक लें आवेग शमित करने को आगे  कहां ठौर,
कहने को तो  कुछ तो नहीं बचा चुपचाप चलें जब तक राहें मुड़ जाएँ अपनी कहीं और.
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बुधवार, 18 अगस्त 2010

कुंभ-कथा.

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(स्वतंत्रता के बाद पहले महाकुंभ के अवसर पर ऐसी अव्यवस्था हो गई  कि भीड़ में अँधाधुंध भागदड़ मच गई और बहुत लोग गिर-गिर कर रौंदे जाते रहे -अधिकारी वर्ग पं. नेहरू के स्वागत में व्यस्त था.तब लिखी गई थी यह  - कुंभ-कथा)
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मानव के यह आँसू शायद सूख चलें पर ,
मानवता के अश्रु-लिखित यह करुण कहानी अमर रहेगी !
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स्वतंत्रता के बाद प्रथम ही ,महामृत्यु का निर्मम मेला ,
जाने कौन पाप की छाया लाई महाकुंभ की बेला .
गंगा-यमुना के संगम पर जीवन-मृत्यु गले मिलते थे .
आँसू और रक्त की बूँदें लिए मानवी तन चलते थे .
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जहाँ अमृत की बूँद गिरी थी वहीं मृत्यु का नृत्य हुआ था .
तीर्थराज की पुण्य-भूमि में भक्ति भाव वीभत्स हुआ था ,
घोर अमाँ की काली छाया, यह संगम श्मशान बना था,
बच कर भागें कहाँ? पगों के आगे तो व्यवधान घना था .
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गंग-यमुन धाराएँ बहतीं  ,कहो सरस्वति ,स्वर सरिता बन
 इधर काल अपना मुँह बाए, उधऱ हो रहा था अभिनन्दन !
खेल रही थी मृत्यु भाग्य की ओट लिए नर के प्राणों से
जननायक के कर्ण बंद थे किन्तु वहीं स्वागत गानों से ,
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उन भोगों में डूब कौन सुन पाता तट के आकुल- क्रन्दन !
राग-रंग थे वहाँ  दावतें उड़ती थीं ,उड़ते थे व्यंजन,
 अरी त्रिवेणी ,कहाँ बहा ले जाती तू यह रक्तिम धारा ,
तीरथ व्रत का यही समापन ,किसके पापों का निपटारा .
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 तीर्थराज की पुण्य-भूमिपर जब-जब उमड़ेगा जन-सागर ,
पुरा कथा की नयी वर्णना इसको किसका पाप कहेगी !
 मानवता के अश्रुलिखित ,यह करुण कहानी अमर रहेगी !
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शनिवार, 7 अगस्त 2010

सूरज देर से निकला -

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आज सूरज
रोज से कुछ देर से निकला !
लो ,तुम्हारी हो गई सच बात ,
सूरज देर से निकला !
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कुछ लगा ऐसा कि लम्बी हो गई है रात !
 और रुक सी गई ,
तारों की चढी बारात .
धीमी पड गई चलती हुई हर साँस
सूरज देर से निकला !
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घडी धीरे चल रही ,
कुछ सोचता सा काल
धर रहा है धरा पर हर पग सम्हाल-सम्हाल !
बँधा किसकी बाँह में आकाश ,
सूरज देर से निकला !
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अर्ध-निद्रा या कि सपनों की कुहक- माया
नेह भीगे  मृदुल स्वर लोरी सुनाते थे ,
अनसुने से गीत
रह-रह गूँज जाते थे !
हर नियम अलसा गया है आज
सूरज देर से निकला !
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देर तक अपना मुझे
टेरा किया कोई !
लगा सारी रात मैं
बिल्कुल नहीं सोई !
फिर कुहासा दृष्टि को बाँधे रहा ऐसा,
कि सूरज देर से निकला !
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