मंगलवार, 4 मई 2010

रत्ना की चाह -

केवल तुम्हारी थी
थोड़ा-सा आत्म-तोष चाहता रहा था मन
पीहर में पति- सुख पा इठलाती बाला बन
मन में उछाह भर ताज़ा हो जाने का ,
बार-बार आने का
अवसर,
सुहाग-सुख पाने का .
*
थोड़ा सा संयम ही
चाहा था रत्ना ने ,
भिंच न जाय मनःकाय
थोड़ा अवकाश रहे,
खुला-धुला ,घुटन रहित ,
नूतन बन जाए
पास आने की चाह .
*
कैसे थाह पाता
विवश नारी का खीझा स्वर
तुलसी ,तुम्हारा नर!
स्वामी हो रहो सदा
अधिकारों से समर्थ
पति की यही तो शर्त !
*
सह न सके .
त्याग गए कुंठा भऱ .
सारा अनर्थ-दोष
एकाकी नारी पर !

1 टिप्पणी: