भरते हों आलोक निरन्तर ,स्नेह भरा ले आकुल अन्तर ,
पथिक जहाँ प्रस्थान तुम्हारा ,वहीं बहें मेरे मंगल स्वर !
जाओ तोड शृंखला तम की ,मेरे गीत तुम्हारे पथ में !
*
वे अनन्त सुख के लघुतम क्षण ,भरें हृदय मे नव नव स्पन्दन !
जीवन के तपते आतप पर छायें मेरे नयनों के कण !
मेरे पथिक बढो मुस्काते ,चिर आशीष तुम्हारे पथ में !
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विस्मृत बीती कथा-कहानी ,भर न चले नयनों मे पानी !
आज आखिरी धन्यवाद लो ,जो ली थी मेरी मेहमानी !
दो क्षण का विक्षाम तुम्हारा ,जलती प्रीत तुम्हारे पथ में !
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मस्तक पर अम्बर की छाया ,धरती पर स्वप्नों की माया ,
मीत कभी भी हार न जाना ,वही बहुत जो हमने पाया !
ये पथ की पुकार ही सच है ,हँसती जीत तुम्हारे पथ में !
*
तुम प्रभात के पहले यात्री ,कभी न छाये दुख की रात्री ,
पग की गति हो नये पथिक को नयी प्रेरणा की निर्मात्री !
चाहे सारा विश्व विमुख हो ,कोई मीत तुम्हारे पथ में !
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2009
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बहुत सुंदर सीधा सरल प्रवाहमय गीत....
जवाब देंहटाएं''पग की गति हो नये पथिक को नयी प्रेरणा की निर्मात्री !''