गुरुवार, 12 नवंबर 2009

छिछोर हवायें -

सागर को गुदगुदाती ,छेड़ती थपकती ,
इठलाती हवायें,
धीरे से उसका पानी उड़ा ले जाती हैं !
चौंकती लहरें ,बाहें पसार,दौड़ती हैं बचाने अपना माल ,
उन्हें धकियाती ,लुढ़काती ,शोर मचाती ,
मनचाही नमी सतहों में छुपा ,भाग निकलती हैं बेईमान ,चोर हवायें !

चुलबुली मछलियां,हँसी के बुलबुले छोड़ती हैं ,
खिलखिलाती रोशनी बिखेरती है रंग,
मचलती किरणें दौड़ती हैं बेचैन लहरों को पकड़ने ,
चोरी और सीनाज़ोरी में कम नहीं ये भी !

ऊपर आकाश में हवायें,
इकट्ठा किये हैं ढेर के ढेर बादल !
समेटती -बिखेरती ,तरह-तरह से सँजोती ,
इधर से उधर करती रहती हैं ,
सारे दिन सारी रात
नाच-नाच कर धुनते हुये ,
बादलों के ढेर
आसमान के कोने-कोने में भर देती हैं ,
हल्के-फुल्के उड़ते पहल हर ओर ,
ये बरजोर हवायें !

क्षितिजों तक फैली आकाश की मुस्कान के रंग,
चारों ओर बिखेरती हैं आवारा अछोर हवायें !
गहरा सागर चुप-चुप देखता रहता सारा तमाशा ,
रंग नहाये बादलों की झिलमिलाती कोरें ,
बिंबित - प्रतिबिंबित
इसी गहराई में समा गई हैं दिशायें और सारा आकाश !

पर बादल टिकते कहाँ हैं उन के पास !
बेशर्म हवाओं का उछाह ठण्डा पड़ते ही,
सारी रंगबाज़ी छोड़
बरसते लौट आते हैं अपने घर !

फिर भी मानती नहीं ,
आगे नाथ न पीछे पगहा ,
बेरोक घूमती हैं हर ओर ,
महाछिछोर हवायें !

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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